काजीरंगा
राष्ट्रीय उद्यान का इतिहास और उसके वन्यजीवों का विस्तृत ब्योरा निम्नलिखित है:
1. काजीरंगा
का ऐतिहासिक सफर
- 1904 (संरक्षण की प्रेरणा): भारत के वायसराय लॉर्ड कर्जन की
पत्नी मैरी कर्जन ने असम यात्रा के दौरान काजीरंगा में एक सींग वाले गैंडे की
तलाश की। घंटों घूमने के बाद भी उन्हें एक भी गैंडा नहीं दिखा, केवल
पैरों के निशान मिले। इससे उन्हें एहसास हुआ कि यह जीव विलुप्ति के कगार पर
है।
- 1905 (प्रस्ताव): मैरी कर्जन की पहल पर 1905 में
लगभग 232 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र को सुरक्षित
जंगल बनाने का प्रस्ताव आया।
- 1908: इसे
आधिकारिक तौर पर रिजर्व फॉरेस्ट घोषित किया गया।
- 1916: इसे गेम सेंचुरी बनाया गया।
- 1950: फॉरेस्ट
ऑफिसर पी. डी. स्ट्रेसी (P. D.
Stracey) ने 'गेम'
शब्द हटाकर इसका नाम वाइल्डलाइफ सेंचुरी (वन्यजीव
अभयारण्य) कर दिया।
- 1974: काजीरंगा
को राष्ट्रीय उद्यान (National Park)
का दर्जा मिला।
- 1985: यूनेस्को
(UNESCO) ने इसे विश्व
धरोहर स्थल घोषित किया।
- 2006: इसे टाइगर रिजर्व भी घोषित किया गया।
2. काजीरंगा
के मुख्य वन्यजीव ('बिग फाइव')
100
साल पहले जहाँ यहाँ केवल गिने-चुने
गैंडे बचे थे, वहीं 2022 की गणना के अनुसार काजीरंगा में 2,613 एक सींग वाले गैंडे
मौजूद हैं। यह पूरी दुनिया के एक सींग
वाले गैंडों की आबादी का लगभग
दो-तिहाई (2/3) हिस्सा है।
यह
उद्यान अपने 'बिग फाइव' (Big Five)
जानवरों के लिए प्रसिद्ध है:
- एक सींग वाला गैंडा (One-horned Rhino):
इसका वजन 2,000 किग्रा
से अधिक हो सकता है और इसका प्रसिद्ध सींग हड्डी का नहीं बल्कि कैरोटीन से
बना होता है।
- रॉयल बंगाल टाइगर (Royal Bengal Tiger):
काजीरंगा में बाघों का घनत्व (Density) दुनिया
में सबसे अधिक घनत्व वाले इलाकों में गिना जाता है।
- एशियाई हाथी (Asian Elephant):
यहाँ हाथियों के झुंड का नेतृत्व
एक अनुभवी मादा ('मैट्रियर्क') करती
है।
- जंगली जलभैंसा (Wild Water Buffalo):
विशाल सींगों वाले इस संकटग्रस्त
जीव की दुनिया में सबसे बड़ी बची हुई आबादी में से एक यहाँ है।
- दलदली हिरण / बारहसिंघा (Eastern Swamp Deer):
इसकी पूर्वी नस्ल मुख्य रूप से
काजीरंगा के आसपास ही सुरक्षित बची है।
3. अनूठी
पारिस्थितिकी और सालाना बाढ़
- ब्रह्मपुत्र नदी और प्राकृतिक
रिसेट: हर साल मानसून (जून से सितंबर) में
ब्रह्मपुत्र नदी के उफान से पार्क का बड़ा हिस्सा पानी में डूब जाता है। यह
बाढ़ जंगल को नष्ट नहीं करती,
बल्कि पहाड़ों से उपजाऊ मिट्टी
लाकर और झीलों (बील) की सफाई करके जंगल का 'रिसेट बटन' दबाती
है।
- कारबी आंग्लोंग प्रवास: बाढ़ के दौरान जानवर हाईवे पार
करके दक्षिण में स्थित
कारबी आंग्लोंग की पहाड़ियों की ओर चले जाते हैं।
काजीरंगा
राष्ट्रीय उद्यान के 'बिग
फाइव' (Big Five) में
निम्नलिखित पाँच प्रमुख जानवर शामिल हैं:
- एक सींग वाला गैंडा (One-horned Rhino):
काजीरंगा में पूरी दुनिया के लगभग
दो-तिहाई एक सींग वाले गैंडे पाए जाते हैं।
- रॉयल बंगाल टाइगर (Royal Bengal Tiger):
काजीरंगा दुनिया के उन चुनिंदा
इलाकों में गिना जाता है जहाँ बाघों का घनत्व (डेंसिटी) सबसे अधिक है।
- एशियाई हाथी (Asian Elephant):
यहाँ हाथियों का झुंड एक अनुभवी
मादा (मैट्रियर्क) के नेतृत्व में चलता है।
- जंगली जलभैंसा (Wild Water Buffalo):
अपने विशाल सींगों के लिए प्रसिद्ध
इस संकटग्रस्त जीव की दुनिया में सबसे बड़ी बची हुई आबादी में से एक यहाँ
रहती है।
- दलदली हिरण / बारहसिंघा (Eastern Swamp Deer):
बारहसिंघा की पूर्वी नस्ल (ईस्टर्न
स्वैंप डियर) आज लगभग सिर्फ काजीरंगा के आसपास ही बची है।
काजीरंगा
राष्ट्रीय उद्यान की सालाना बाढ़ का चक्र इस प्रकार काम करता है:
1. बाढ़
का आगमन और कारण (जून से सितंबर)
हर
साल मानसून के मौसम में (जून से सितंबर के बीच) हिमालय की बर्फ पिघलने और भारी
बारिश का पानी ब्रह्मपुत्र नदी
में उतरता है। जब ब्रह्मपुत्र नदी उफान
पर आती है, तो इसका पानी काजीरंगा के घास के मैदानों और जंगलों में घुसने
लगता है। बड़ी बाढ़ के सालों में पार्क का एक बहुत बड़ा हिस्सा पानी के नीचे चला
जाता है।
2. प्राकृतिक
'रिसेट बटन'
(पारिस्थितिक महत्व)
पहली
नजर में यह बाढ़ एक आपदा जैसी लगती है,
लेकिन असल में यह काजीरंगा के लिए
जीवनदायिनी है:
- उपजाऊ मिट्टी: नदी अपने साथ पहाड़ों से उपजाऊ
मिट्टी (गाद) लाती है, जो मैदानों पर बिछ जाती है और अगले
साल के लिए घनी हाथी घास उगने में मदद करती है।
- झीलों (बील) की सफाई: बाढ़ का पानी पुरानी गाद और जमी
हुई जलकुंभी को बहा ले जाता है,
जिससे बील फिर से साफ और गहरे हो
जाते हैं।
- जीव-जंतुओं के लिए भोजन: बाढ़ अपने साथ नई मछलियां छोड़
जाती है, जो पक्षियों और अन्य जीवों का पेट
भरती हैं।
3. वन्यजीवों
का पलायन (कारबी आंग्लोंग की पहाड़ियां)
जब
पार्क में पानी चढ़ने लगता है, तो गैंडे,
हाथी,
बाघ और हिरण दक्षिण की ओर कारबी आंग्लोंग की ऊंची पहाड़ियों की
तरफ बढ़ना शुरू कर देते हैं।
- हाईवे और कॉरिडोर: पार्क और पहाड़ियों के बीच एक
व्यस्त नेशनल हाईवे गुजरता है। बाढ़ के दिनों में जानवरों के सुरक्षित गुजरने
के लिए वाहनों की रफ्तार सीमित कर दी जाती है और स्पीड कॉरिडोर का इस्तेमाल
होता है।
- कृत्रिम टीले: जो जानवर पहाड़ियों तक नहीं पहुंच
पाते, उनके लिए पार्क के अंदर मिट्टी के
ऊंचे टीले बनाए गए हैं, जहाँ वे पानी उतरने तक शरण लेते
हैं।
4. पानी
उतरना और पुनः जीवन चक्र
मानसून
के बाद जब पानी उतरता है, तो जानवर वापस अपने निचले मैदानों में लौट आते हैं। वन विभाग
और स्थानीय लोग मिलकर पार्क को फिर से व्यवस्थित करते हैं और नई हरी घास उगने के
साथ यह जीवन चक्र दोबारा शुरू हो जाता है।

0 Comments