मध्य प्रदेश के बालाघाट जिले में बैगा आदिवासी समुदाय के बच्चों की रहस्यमयी मौत और कुपोषण की दर्दनाक घटना सामने आई है, जिसका मुख्य कारण स्वास्थ्य सेवाओं की भारी कमी, कुपोषण, टीकाकरण का अभाव और अंधविश्वास है। इन क्षेत्रों में बच्चों की मौत के पीछे मलेरिया और खसरा (मीजल्स) जैसी संक्रामक बीमारियां जिम्मेदार हैं, जो खराब साफ-सफाई और चिकित्सा सुविधा न मिलने के कारण तेजी से फैलीं। बैगा समुदाय के लोग अशिक्षा और बाहरी दुनिया से कटाव के कारण पारंपरिक ओझा-प्रथा पर भरोसा करते हैं और सरकारी मदद से डरकर छिप जाते हैं। इस संकट के बाद प्रशासन ने टीकाकरण अभियान, माइक्रो डेवलपमेंट प्लान और बुनियादी सुविधाओं को बेहतर बनाने के प्रयास शुरू किए हैं। इसके साथ ही, स्थानीय स्तर पर डॉक्टरों और सामाजिक कार्यकर्ताओं के सराहनीय प्रयासों से स्थिति पर नियंत्रण पाने और आदिवासियों को मुख्यधारा से जोड़ने का निरंतर प्रयास जारी है।
बालाघाट
के बैगा आदिवासी बहुल इलाकों (विशेषकर बिरसा और बैहर ब्लॉक) में बच्चों की मौत के
पीछे कोई एक अकेली वजह नहीं थी, बल्कि यह कई
गंभीर स्वास्थ्य और सामाजिक कारणों का एक जटिल संयोजन (Multi-factorial Combo)
था। मुख्य कारण निम्नलिखित हैं:
- गंभीर कुपोषण (Severe Malnutrition):
क्षेत्र के बैगा बच्चे पहले से ही
अत्यधिक कुपोषित थे। गरीबी के कारण उन्हें पौष्टिक व संतुलित आहार नहीं मिल
पाता था; वे मुख्य रूप से पेज (चावल का
मांड), नमक-मिर्च और सुखाए हुए खाद्य
पदार्थों पर निर्भर थे, जिससे उनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता
बेहद कमजोर हो गई थी।
- संक्रामक बीमारियों का एक साथ
फैलाव (खसरा और मलेरिया):
- खसरा
(Measles): खसरा
एक अत्यधिक संक्रामक बीमारी के रूप में तेजी से बच्चों में फैला।
- मलेरिया
(Malaria): धान
के खेतों और रुके हुए पानी (झरनों व गड्ढों) में पनपने वाले मच्छरों के कारण
बच्चे मलेरिया से पीड़ित हुए।
- कुपोषण
के साथ-साथ खसरा, मलेरिया और त्वचा संक्रमण (Scabies) का
एक साथ होना बच्चों के लिए जानलेवा साबित हुआ।
- टीकाकरण (Vaccination) का न होना: कागजी
रिकॉर्ड में भले ही टीकाकरण दर्ज था,
लेकिन वास्तविक रूप से धरातल पर कई
बच्चों को समय पर बुनियादी टीके नहीं लगे थे।
- अंधविश्वास और झाड़-फूंक पर
निर्भरता: बुखार या बीमारी होने पर परिजन
बच्चों को अस्पताल ले जाने के बजाय ओझा या पंडा के पास ले जाते थे। पंडा
द्वारा इंजेक्शन/दवाइयों का विरोध करने और झाड़-फूंक में समय बीत जाने के
कारण बच्चों को सही समय पर डॉक्टरी इलाज नहीं मिल पाता था।
- शर्मीला स्वभाव, डर
और अज्ञानता: बैगा जनजाति के लोग शर्मीले और
बाहरी दुनिया से कटे हुए हैं। जब स्वास्थ्य कर्मी या एंबुलेंस गांव में आती
थी, तो लोग डर के मारे बच्चों को लेकर
जंगलों में छिप जाते थे या घर बंद कर लेते थे।
- मौसमी पलायन (Seasonal Migration):
काम और मजदूरी की तलाश में
परिवारों का दूसरे राज्यों (जैसे तेलंगाना,
आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र)
में पलायन होता है, जिससे बच्चों के टीकाकरण और
स्वास्थ्य देखभाल का क्रम टूट जाता था।
- स्वास्थ्य सुविधाओं की दूरी और
दूरस्थ क्षेत्र: गांव से अस्पतालों की दूरी 15 से
20 किलोमीटर तक थी और सुदूर
नक्सल-प्रभावित इलाका होने के कारण स्वास्थ्य सेवाएं समय पर मरीजों तक नहीं
पहुंच पाती थीं।
बालाघाट
में बैगा बहुल और नक्सल-प्रभावित क्षेत्रों के लिए प्रशासन ने एक विशेष माइक्रो-डेवलपमेंट प्लान (Micro-Development Plan)
तैयार कर शासन को भेजा है। इस प्लान का
मुख्य उद्देश्य इन सुदूर गांवों में बुनियादी सुविधाओं का विस्तार करना और बैगा
समुदाय को मुख्यधारा से जोड़ना है।
इस
माइक्रो-डेवलपमेंट प्लान की मुख्य बातें निम्नलिखित हैं:
- 100 सबसे अधिक प्रभावित गांवों का चयन: क्षेत्र
के लगभग 380 प्रभावित गांवों में से सबसे
ज्यादा प्रभावित 100 गांवों (जैसे कुंडे कसा, बुंदारी, अडोरी, मछुदा
आदि) को इस प्लान में प्राथमिकता पर शामिल किया गया है।
- 14 विभागों का एकीकृत समन्वय: इस
योजना में केवल स्वास्थ्य विभाग ही नहीं,
बल्कि स्वास्थ्य, महिला
एवं बाल विकास, ग्रामीण विकास, लोक
स्वास्थ्य यांत्रिकी (PHE),
बिजली और सड़क निर्माण जैसे 14 अलग-अलग
विभागों को एक साथ जोड़ा गया है।
- स्वास्थ्य इंफ्रास्ट्रक्चर और मानव
संसाधन का विस्तार:
- जिन
गांवों में जरूरत है, वहां नए प्राथमिक स्वास्थ्य
केंद्र (PHC) और उप-स्वास्थ्य केंद्र खोले
जाएंगे।
- नए
स्वास्थ्य केंद्रों के साथ-साथ डॉक्टरों,
कम्युनिटी हेल्थ वर्कर्स, आशा
कार्यकर्ताओं और एएनएम (ANM)
की नई पदस्थापना की जाएगी।
- राशन
आपूर्ति के लिए नई पीडीएस (PDS)
दुकानें और नई आंगनबाड़ी इमारतें
बनाई जाएंगी।
- शिक्षा सुधार और ट्राइबल हॉस्टल:
- जर्जर
स्कूल भवनों की मरम्मत और नए प्राथमिक स्कूल स्वीकृत किए जाएंगे।
- स्थानीय
स्तर पर ट्राइबल हॉस्टल्स (जनजातीय
छात्रावास) खोले जाएंगे, ताकि
बैगा बच्चे अपने क्षेत्र में ही रहकर सुरक्षित माहौल में पढ़ाई कर सकें।
- मध्याह्न
भोजन (Mid-Day Meal) की जियो-टैग मॉनिटरिंग की जा रही
है ताकि बच्चों को समय पर पौष्टिक भोजन मिल सके।
- वनाधिकार पट्टों का पुनरीक्षण (Land Rights):
- पूर्व
में खारिज हुए लगभग
225 वनाधिकार पट्टा मामलों की समीक्षा (रिव्यू) शुरू की गई
है, जिनमें से पात्र परिवारों को जमीन
के पट्टे आवंटित किए जा रहे हैं (जैसे सोनगुडा पंचायत में 12 पट्टे
दिए गए)।
- स्वरोजगार और मार्केट लिंकेज
(आर्थिक सशक्तिकरण):
- बैगा
समुदाय द्वारा बनाए जाने वाले
बांस हस्तशिल्प (Bamboo Handicrafts) के
लिए बाजार लिंकेज (Market Linkages) उपलब्ध कराया जाएगा।
- मलाजखंड
क्षेत्र में लीची और एवोकाडो जैसी फसलों के लिए किसानों के एफपीओ (FPO - Farmer Producer Organization) और कोऑपरेटिव क्लस्टर बनाए
जाएंगे।

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