बिहार बाढ़ संकट और व्यवस्था की लाचारी

जिस धरती ने उस दुनिया को जीरो दिया जब जीरो दिया मेरे भारत ने वो भारत का सबसे गरीब राज्य कैसे हो सकता है जिस धरती ने इस दुनिया को राजनीति सिखाई जिसने चाणक्य नीति दी वो चाणक्य जहां बिहार से थे वो बिहार इस देश का सबसे गरीब राज्य कैसे हो सकता है जिस धरती ने बुद्ध को दिया जिस धरती ने तमाम बुद्धिजीवी यहां से निकले तमाम आईएएस पीसीएस अधिकारी बड़े-बड़े नेता यहां से निकले वो धरती देश के सबसे पिछड़े और गरीब राज्यों में कैसे शुमार है यह कहानी आपको जानने के लिए इस वीडियो को पूरा देखना पड़ेगा और उसकी इमारतें इसके पिछड़ेपन की इसकी गरीबी की खंडहर जो है वो यहीं पे है  अभी सारण जिले के मढ़ोरा में है मढ़ोरा एक जमाने में चीनी मील के लिए जाना जाता था एक जमाने में मॉर्टन की चॉकलेट बनती थी बचपन में जिन्होंने हमसे जो उम्र में थोड़े बड़े रहे उन्होंने कभी टीवी में देखा होगा उनको उसका स्वाद स्वाद भी याद होगा कहानी इसी चीनी मील की जिसके लिए कभी प्रधानमंत्री ने आसपास आकर के कहा या मोतिहारी में कहा कि मैं अगली बार आऊंगा 2014 में भाषण दिया था तो कहा था कि मैं इसी चीनी मील की चाय पी के इसकी मिठास की चाय बनेगी और उससे मैं पऊंगा लेकिन आज तक कोई चीनी मिल नहीं बनी है और राज्य सरकारों ने क्या किया केंद्र सरकार ने क्या किया सबका हिसाब आज होने वाला है मौरा में हमारे साथ बुजुर्ग हैं यहां के हम इनको लेकर आए हैं पुराने व्यक्ति हैं हमने खोजा कि भाई कोई बताए तो ये कैसा था जब हम यहां आए इतनी बड़ी इमारत है इतने बड़े-बड़े मशीन लगे हुए हैं एकदम खंडर हुआ है  शिव कुमार प्रसाद गुप्ता ये चीनी मिल का मेन गेट है थोड़ा बताएंगे इसके बारे में हां इसके बारे में बताएंगे जब चीनी मिल माने जब हमारा देश गुलाम था जब अंग्रेजों की शासन थी तो अंग्रेजों के शासन में हिंदुस्तान में सबसे पहला मिल जो है चार फैक्ट्रियां यहां अंग्रेजों ने बैठाने का काम किया चीनी मिल सरा मिल और आपका जो है सो सारण इंजीनियरिंग जो सामने है वहां और आपका कौन कॉनफेक्शनरी जो है एक छाता और मंगा दीजिएगा कॉनफेक्शनरी चार मिले लगी यहां 1904 में 1904 में गुलाम हिंदुस्तान में अंग्रेजों ने सबसे पहले यही चार फैक्ट्रियां लगाई और मरहौरा जो है सो औद्योगिक नगरी के रूप में जो है सो इसको जाने जाना लगा खासियत ये थी कि सारण इंजीनियरिंग था इसके जो रोलट जो चेनी मिलके बनते थे विदेश के लोग के भी यहां से बन के जाता था और मर्टन का जो चॉकलेट होता था वो खुशबूदार जो विदेश तक ख्याति वहीं से मिली मन और यहां का जो चीनी मिलता था सबसे टॉप चीनी चीनी बनता था छोटा दाना सफेद दाना तो इसमें बखूबी थी चीनी में मिठाई में और सारन इंजीनियरिंग की खूबसूरती थी कि जितने भी देश विदेश के रोलर जो थे चीनी मिल में चले जाते थे सब यहीं से बनके जाते थे तो इसका एक औद्योगिक नगरी में ख्याति बना और यहां के लोग खुशहाल इस बात से हो गए उस जमाने में कि अगल-बगल की जितनी भी जमीनें थी चीनी मिलने एक्वायर करके किसानों को प्रोत्साहित किया गन्ना बेचने के लिए और गन्ना हमारा मुख्य जो है सो बिजनेस बन गया गन्नाकि गन्ना का फसल एक बार लगाया जाता है तो उसको तीन बार हम काटते हैं तो जेन्युइन हो गया दूसरका भी बढ़िया हो गया तीसरा में तीसरे के बाद में बदलते थे माने एक बार लगाते थे और तीन बार काटते थे और उससे हमारे घर का परिवार का शादी ब्याह पढ़ाई लिखाई बच्चों को शिक्षा दीक्षा है ना ये सारे काम चलता था और यहां जो व्यवसायिक लोग बसे थे उनका भी भविष्य उज्जवल था क्योंकि गणना के माध्यम से जो पेमेंट होता था वह हमारे बाजार में आता था 70% फीसदी पैसा फैक्ट्री के द्वारा कमाए गए कर्मचारियों के द्वारा बाजार में मार्केट में व्यवसाय को मिलता था वह भी खुशहाल और कर्मचारी भी खुशहाल और अगर अरना कोठी है वहां 52 एकड़ 55 एकड़ है उसके बाद में आपका जो है सतरैया में देवरिया है वहां भी 100 एकड़ से ज्यादा जमीन है और चीनी मिल का एक रेलवे प बना ये जो अभी यहां है निकल गया है और जो प देख रहे थे जहां दिनेश मिष्ठान भंडार बना हुआ है वहां जो छोटा छोटा इंजन होता है जो डीजल इंजन होता था उस इंजन से वहां स्टेशन से आपका सिद्ध होलिया वगैरह से गन्ना आता था लाता था यहां से आता था लेकिन एक वो आए क्या पवन सिंह नाम था उनका मैनेजर यहां तो उन्होंने कहा कि गन्ना की बहुत चोरी होती है लूट होती है तो पाइट को उखलवा दिया और ट्रक लगवा दिया उससे कम होगा लेकिन वैसा हुआ नहीं और धीरे-धीरे करके आने वाले समय में इस फैक्ट्रियां चारों के चारों बंद हो गई 94 तक सब बंद हो गया अच्छा तो आपने मोटा-मोटी परिचय बताया हम लोग थोड़ा अंदर चलते हैं जरा देखें अभी और तौफीक तुम इधर से आ जाओ और कोई एक आदमी इनके पीछे रहना ताकि इधर जंगल पूरा घास झंका आगे आगे चल बेटा कोई बाबा एक बात बताइए आपकी उम्र कितनी हो गई हमारी हमारा उम्र 75 अबव चलता है 75 तो ये जो आपने खुशहाली देखी है ये किस साल की बात है आपने तो सब देखा होगा इसको फर्क वर्क करते हुए अब सवाल ऐसा है कि हमारा तो जन्म 51 का है 50 का लेकिन जब आदमी 18 20 साल का होता है तो समझ में आता है ना तो हम मरवरा को देख रहे हैं माने 60 के दशक से माने आठ साल के बाद में वहां गर्द भी अशांत थी तो यहां ये इतना रौनक था कि बिजली का सप्लाई उस जमाने में भी बिजली सब जगह कटता था लेकिन मौरा में नहीं कटता था क्योंकि एक औद्योगिक नगरी थी क्योंकि सप्लाई सरकार का इससे इसको बेनिफिट होता था तो सब जगह की बिजली गुल होती थी लेकिन यहां महावरा में बिजली कभी नहीं कटता था क्योंकि पहचान एक औद्योगिक नगरी में थी और इसमें और खासियत था एक 52 कमरा था जो वहां टूटा हुआ है 52 थोड़ा दिखाइएगा वहां 52 कमरा तो 60 के दशक में 52 में तो फर्स्ट इलेक्शन हुआ लेकिन 60 के दशक में जब हमारे बिहार के मंत्री लोग आते थे चाहे कोई भी मंत्री हो पदाधिकारी हो आईएस आईपीएस हो जिला के भी चाहे बाहर का तो पहले वो गंडक पुल नहीं बना था रेवा में वो लोग जब मुजफ्फरपुर से आते थे गर्मी के दिनों में तो नाव से पार करके बाउंड कमरा में ठहरते थे इतना ठंडा सुकून मिलता था और वहां बावर्ती था जो उन लोगों के कम सैया था तो उन लोगों की सेवा में वो लगा रहता था और जितने भी आईएस आईपीएस अधिकारी थे या बड़े-बड़े लोग थे उस कमरा में ठहरने थे यानी उत्तर बिहार का एक यूनिक टेस्ट था ये सर जरा कैमरा दिखाना तौफीक ये देखिए कितना खूबसूरत सा खंडहर है बड़ा-बड़ा खूबसूरत सा खंडर इसलिए कह रहा हूं इसकी खूबसूरती मैं इसलिए इस शब्द दे रहा हूं क्योंकि इसको खूबसूरत बनाया है यहां के नेताओं ने यहां की नीतियों ने क्योंकि कभी यह खुशहाल हुआ करता था लेकिन अब जैसे अभी हम इसको जा रहे हैं एक जंगली रास्ता है बाबा आराम से आइएगा आप ते अब पूरा आसपास घास बन गई है तो इसको मैं खूबसूरत जो शब्द कह रहा हूं उसको तंज के तौर पे लीजिएगा इस देश के यहां इस बिहार के तमाम नेता हैं अरे बाप रे बाप मेन मशीन उधर है मेन मशीन वहां पे है जहां पे गन्ना पेता है वहां पे मेन मशीन है रोलर है यह रोलर है गन्ना पिराई यहां होता था यह जो है ना यह यहां से गन्ना का पेराई होता था जाता था ऊपर से सब आता था समझे कि नहीं हां पेन है सारा वहां पे शुगर तैयार होती थी ठीक है मेरे दादा जी थे पेन इंचार्ज यहां पे अच्छा हम मेरी तीन पीढ़ियां इस फैक्ट्री में काम की हुई है चीफ केमिस्ट मेरे परदादा थे यहां पे लेट नारायण सिंह रामनारायण सिंह और वीरेंद्र कुमार सिंह मेरे दादा जी थे जो कि वो पैन इंचार्ज थे यहां पे यहां पे इसकी कहानी थी कि अगर चीनी एक साइज का नहीं बनता था ना तो पूरे पैन में जितना चीनी बना हुआ रहता था उसको दोबारा पिघला दिया जाता था ये टूट के गिरेगा तो नहीं ना नहीं नहीं और बहुत पिलर पे है बाबा कितने लोग यहां काम करते रहे होंगे आपका क्या नाम है मेरा नाम राहुल भारद्वाज है कितने लोग बाबा यहां काम करते रहे होंगे किसी जमाने वह उस जमाने में कम से कम यहां जो था माने रेगुलर और कैजुअल माने जो सीजन ख़ हो जाता था मिलाके 400 400 एंप्लई लोग थे 4500 हां मतलब 4500 परिवारों का घर चलता था इसमें चलता था और वैसे काम होता था और उसमें जब सीजन बंद हो जाता था तो जो सीजन लोग थे वो बैठ जाते थे और परमानेंट स्टाफ लोग काम करते थे तो ये चीनी भी सरकारी थी नहीं नहीं माने कैंसर एक अंग्रेजों के द्वारा बनाया गया एक लिमिटेड कंपनी था वो जो कानपुर से गाइड होती थी उसमें बहुत सारी फैक्ट्रियां थी समझे कि नहीं समझे ना ये इतना बड़ा है और कभी इसको बना दोबारा बिल्ड करने की कोशिश नहीं हुई नहीं नहीं जहां बिगड़ता था उसको लोग बनाते थे लेकिन इसका कंस्ट्रक्शन इतना ना मजबूत था इतना ना हैवी बना था अंग्रेजों के द्वारा कि इसको में छूने की जरूरत नहीं पड़ती थी नहीं नहीं मैं कह रहा हूं कि जब ये बंद हो गई अच्छा अब थोड़ा इसके बंद होने की कहानी बताइए बंद क्यों बंद होने का तो कई एक कारण है या तो एक इच्छा शिक कम हो जाता है तब आप जैसे आप प्रो हो जाते हैं तो इच्छा शक्ति कम हो जाती है तो इच्छा शक्ति कम हो जाती है तो काम करने में मजबूरी हो जाती है एक लंबे समय से काम करता था और आने वाले दिनों कालांतर में धीरे धीरे धीरे-धीरे या सामाजिक लोग हो या राजनेता लोग हो या और भी कुछ लोग हो और भिन्न-भिन्न तरह से जब इसमें शिकंजा होने लगा और इसमें लूटखसोट बढ़ने लगा चाहे जो भी हो राजनिक प्रभाव हो सामाजिक प्रभाव हो या कोई निजी बल भी हो बाहुबल जिसको कहते हैं चाहे अपना बात हो तो बहुत सा कारण है जिसको हम गिरा नहीं सकते हैं और कह भी नहीं सकते हैं जानकारी नहीं है तो एन केन प्रकार ने धीरे-धीरे यह बंद हो गया आप लोग को क्या वजह पता चली इसके बंद होने की देखिए एक तो ये थी प्रॉब्लम इसमें कि 19 सेंचुरी की फैक्ट्री थी तो समय के साथ इसने बदलाव नहीं किया टेक्निकली दूसरा रीजन जो था इसका इथेनॉल तो इथेनॉल यूनिट जो शुगर फैक्ट्री की होती है वह जान होती है शुगर बनाने से शुगर मिल नहीं चलती है इथेनॉल बनाने से चलती है शुगर एक ऐसी चीज है शुगर केन का कोई भी चीज वेस्ट नहीं होता है एथेनॉल का ऊपर क्या हुआ यहां पे लोकल नेताओं ने उस वक्त के एक पोलशन डिपार्टमेंट से यहां पे जांच कमेटी का गठन करवाया विधानसभा से गठन हुआ और उसके बाद धीरे-धीरे पोलशन के आर में इथेनॉल यूनिट को बंद कर दिया गया फायदा मिलना बंद हो गया शुगर फैक्ट्री का इसके कारण धीरे-धीरे लास्ट ईयर जो उसने चलाया 94 में एस सी शर्मा मैनेजर थे उस वक्त यहां पे और उन्होंने 1 लाख बोरी उस वक्त प्रोडक्शन किया था जो कि आजकल के जमाने में अगर देखा जाए तो 1 लाख बोरी कुछ मायने नहीं रखता उस वक्त क्विंटल का बोरी होता था 50 केजी का नहीं होता था उसके बाद बंद हो गया लास्ट वही 94 सीजन चला के बंद हो गया धीरे-धीरे और लेकिन आज तक पेपर में अभी तक शुगर शुगर फैक्ट्री बंद नहीं हुई है कागजों में है दर्श कागजों में अभी तक वो फैक्ट्री बंद नहीं हुई है कितने एरिया में है लाल इमली धारीवाल के अंदर था फैक्ट्री उसके बाद यह अभी कपड़ा मंत्रालय के अंदर चला गया और अब पता नहीं क्या चल रहा है क्या नहीं है लेबर यूनियन अभी यहां पे बनी है तुरंत हाल ही में जो कि वो अपना केस वगैरह फाइल करके लगभग 450 लोग गए हुए हैं लेबर कोर्ट में जिनका करोड़ों का बाका मतलब पैसा बकाया है यहां पे उसके बाद हम लोग तो खुद किसान थे ही और मेरे दादा परदादा इसमें काम भी करते थे हम लोग का भी गन्ने का पैसा बहुत सारा बाकी है तीन-तीन सीजन का पैसा बाकी है उस जमाने का उस जमाने का क्योंकि यहां पे मेन खेती जो था किसानों का वो धान गेहूं नहीं होता था गन्ना होता था गन्ना होता था अच्छा मैं इसकी दीवारों को देख रहा हूं तो इसकी दीवार बाबा 27-27 इंच की दीवारें हैं 20 इंच दीवारें हैं वह भी सुर्खी और चूना का दीवारें हैं हां कोई भी इसमें सीमेंट यूज़ नहीं हुआ है अगर ये ईंट भी जो है यहीं पे नदी के उस पार बगल में ही पथाई हुई है जहां पे अभी कॉलेज इंटर कॉलेज चलता है वहीं पे और ये चकिया के एक ठेकेदार थे जिनको यह काम सारा मिला हुआ था उस जमाने में नहीं तो यह जो अब आप बता रहे हैं कि इधर मतलब यह इतनी ईंटें अभी भी इसकी साबुत है इसको अगर निकाल के बनाया जाए तो एक आध मकान तो आराम से बन जाएगा बिल्कुल बन जाएगा आप खुद देख सकते हैं कि यहां पे आपको अगर 20 इंची या 30 इंची की दीवारें दिखाई दे रही है तो उधर जो है 5-5 फुट मोटी दीवारें हैं ये कितने बड़े एरिया में है बाबू बाबा ये ये कम से कम इसका एरिया हम उनको लगता है कि 15 20 एकड़ से कम नहीं होगा सर 30 एकड़ के आसपास लगभग में 30 एकड़ म यह जो एरिया इसका वहां वह नेपाली टोल कितने किसान जुड़े रहे होंगे उस समय उस समय इसमें आसपास ये केवल मौड़ा विधानसभा के ही किसान नहीं थे यहां पे अमन तरैया मसरा मसरा के सारे आसपास के पांच छह विधानसभा कोटिया आपको डेरनी सुतिहार परसा बई बनौता बनकेवा की बात की है वो ट्रॉली गाड़ी इसीलिए चलाई गई थी कि वह सारी दूरदराज से गन्ना लाया लाया जा सकता है समझो बनकरवा इसका लाश था इधर आना रास्ता उधर देवरिया लाश था अच्छा एक बताइए आप कितने साल बाद यहां आ रहे हैं कहां इस इसमें इसमें तो हम मील में तो बहुत वर्षों के बाद मारे आते हैं चले जाते हैं आप जब आप आ रहे थे तो आपके तकलीफ पीड़ा हो रही थी कि ये क्या हो गया हृदय था मरवरा हृदय अस्थली है चीनी मिल ये चारों फैक्ट्रियां है जिसका हृदय कलेजा जिसके लीवर में गुर्दा में बीमारी पकड़ ले तो आदमी जिंदा रहेगा आप ऐसा कहते हैं तो हम लोग यहां के किसानों के एकिए कि इसको बंद हो जाने से उसके लीवर गुर्दा में बीमारी पकड़ लिया इनकम ऑफ सोर्सेस खत्म हो गया हमारा इनकम ऑफ सोर्सेस खत्म हो गया तो अब रह गया सवाल कि इनकम ऑफ सोर्सेस का बहुत बड़ा माध्यम था ये फैक्ट्रियां जो यहां तक नहीं कि कई एक आठ से 10 प्रखंडों को जोड़ता था पारू तक के लोग आते थे मुजफ्फरपुर पारू जो वहां से लेके बनकेरवा बथई बनौता उधर समझ गया कि पूरे इलाके के लोगों को इलाके के लोगों आसपास कई जो है तो जैसे मैं कह रहा हूं तब से लेकर के जब से यह 94 बंद हुआ तब से लेकर अब तक कितने चुनाव हो गए दसियों चुनाव हो गए लोकसभा के कई चुनाव हो गए चार पांच चुनाव हो गए नेता आते हैं वादा करते हैं प्रधानमंत्री का एक बयान था मोतिहारी में कि शुगर मिल बनवाएंगे जी लालू यादव की पार्टी वो अपना करती है लालू जी हो चाहे नीतीश जी हो सब लोग वादे करते हैं आप लोग नेताओं के इन वादों या मोदी जी हो या राहुल गांधी हो क्या सोचते हैं इसको मैं बताता हूं लास्ट में फैक्ट्री तो बंद हुआ सारण इंजीनियरिंग की बात थी वो गया वाले क्या थे जो वहां मकान वहां में थे गया वाले बहुत गया थी सारण फैक्ट्री में नहीं मैनेजर थे वो डी डी सिंह हम लोगों से मिले और कहे कि अब सारण मिल भी बंद होने के कगार में है आप लोग मत हम लोग राजी से मिले थे उस वक्त मैं बात करता हूं तो लाल जी कहे कि भाई देखो धीरेधी फैक्ट्री बन पुराना हो गया है ना आई स्टेट गवर्नमेंट का तो बात है उसमें कर्जा भी कर्जा के लिए गए थे इंजीनियरिंग जो बनी थी ना शुरू में सेकंड वर्ल्ड वार की ट्रेन बनी तो वहां पे वो क्या होता था कि तोप का गोला बनाया जाता था जो कवर होता है तोप गोला का वो बनाया जाता था और सारन इंजीनियरिंग बाद में उसके पास काम क्या आया तो यह शुगर फैक्ट्री का क्योंकि जब वर्ल्ड वॉर खत्म हुआ तो काम उसका खत्म हो गया उसके बाद क्या हुआ कि उसमें आया कि इसके जो रोलर्स थे उनको बनाने का काम तो धीरे धीरे धीरे धीरे वह राजनीतिक पतन की तरफ चलती चली गई बनता वो वैसे ही वैसी फैक्ट्री धीरे-धीरे बंद हो गई और सारी फैक्ट्रियों के साथ यही कहानियां हुई मैं आपका क्या नाम बताया था आपने राहुल भारद्वाज राहुल जी मैं जरा बाबा की बात पूरी हो जाए मैं राजनीति वाले विषय पे आपसे बात कर रहा था कि जो नेता वादा करते हैं उस पे मैं बताता हूं आपको वही मैं बात चले गए दूसरे विषय पर तो उन्होंने कहा कि भाई देखो फैक्ट्री तो धीरे-धीरे बंद हो गया लेकिन हमारा प्लानिंग है कि जब हम सत्ता में आएंगे या केंद्र में जाएंगे हम तो हम कुछ सोचेंगे सारन जिला के लिए या बिहार के लिए है ना तब फैक्ट्री तो सब बंद हो गई और उसी का परिणाम है जब वह रेल मंत्री बने समझे कि नहीं तो उन्होंने कहा कि मैं ऐसा कुछ बढ़ा दूंगी उससे चार-चार फैक्ट्री का छह फैक्ट्री उसमें समा जाएगा तो आपके हमारे यहां रेल चक्का यहां मिल गया जो डीजल मौरा मिल गया किसने लालू लालू यादव लालू यादव लालू जी के समय पे फैक्ट्री बनी रेल चक्का हां मैं बताता हूं और लालू जी जब रेल मंत्री थे तो बिहार में 55000 करोड़ का स्पेशल पैकेज रेल मंत्रालय से पारित हुआ 55000 को 1000 2000 करोड़ की नहीं क्योंकि मैं भी मेंबर था एक रेल का और उस जमाने में मढवरा में यह आपका जो है सो इलेक्ट्रिक वाला बन गया डीजल वाला और पूर्णिया मधेपुरा में इलेक्ट्रिक बन गया बेला में चक्का कारखाना बन गया और क्योंकि सर्वे सर्वा थी सोनिया गांधी उन्होंने भी कहा कि लालू जी क्या मेरे यहां कुछ नहीं बरेली में तो उनके यहां भी एक कारखाना रेलवे का डब्बा रायबरेली में हां रायपुर डब्बा बनाने का कारखाना पूरा और लालू जी के रहते हुए पॉलिटिकल जब बात करते हैं तो हमको लगता है जब से हम होश संभाले हैं 52 में तो हम लोग थे तब उतना होश नहीं था लेकिन 60 के बाद में 10 जितने भी रेल मंत्री बने बिहार से जगजीवन बाबू बने दिग्विजय सिंह बने राम विलास पासवान बने आपके वर्तमान में मुख्यमंत्री जी ये भी बने और ललित नारायण भी थे ललित नारायण मिश्रा थे आपके बनारस वाले जो है सो पंडित करप त्रिपाठी जी थे वो मालदा का गनीखा चौधरी थे कितना जाफर शरीफ भी थे अब कितना का नाम हम गिनाएंगे लेकिन लालू जी ने एक काम दिखाया और उदाहरण पेश किया कि हम रोना इतना जो रोते हैं कि घटा लगा घट गया मैं आपके चैनल के माध्यम से कहता हूं जितने भी राजनीतिक पार्टियां है चाहे किसी जाति धर्म के हो महंगाई सबके लिए है गरीबी सबके लिए है और मानवता सबके लिए है लेकिन लालू जी ने बिहार के माध्यम से और सेंट्रल गवर्नमेंट में रेल मंत्री के माध्यम से जो मैसेज दिया कि चाहे वो भाजपा हो कम्युनिस्ट हो कोई हो एक्स वाई जेड हो कोई माई का लाल आके सामने कह दे कि रेल मंत्री के होते एक किराया बढ़ा इस देश में उस जमाने में और जब 5 वर्षों तक रेल का किराया नहीं बढ़ा श्वेत पत्र जारी हुआ मैनेजमेंट गुरु बन गए और लोगों ने आया कहा कि लालू जी आपने ना रेल का किराया बढ़ाया ना कोई परिवर्तन किया और फिर भी अपने स्वर पर फायदा में गया तो कैसे गया तो उन्होंने अपना टिप्स बताया और एक किराया भी नहीं बढ़ा परियोजना भी हुआ लेकिन जब से सरकार आई है 2014 से रेलवे हमेशा घटा में जाती है आपका क्या नाम है बताया था नाम शिव कुमार गुप्ता हुआ शिव कुमार मैं कह रहा हूं कि बाबा शिव कुमार बाबा आप ऐसा बताएं इतना तो नेता प्रवक्ता भी नहीं बता पाते आप पार्टी से तो नहीं जुड़े हैं आरजेडी से किससे आरजेडी से नहीं हम तो किसी से हम तो हम सब समर्थन हम सोश पार्टी वाले लोग हैं हम तो करपुरी जी लोहिया जी अह आपके जयप्रकाश जी के हम सिद्धांत पे चलने वाले हम इसलिए पूछ रहे हैं ना कि भाई जो दर्शक देख रहा है उसको भी पता रहना चाहिए कि भाई देखिएगा तो पढ़वे नहीं करता है जो पढ़ेगा वो ना बताएगा और जो पढ़वे नहीं करेगा सरकार किसी का हो और सरकार किसी का हो उसमें जो पढ़ेगा तब उसका घोटाला बताएगा बात अच्छा बताएगा अच्छे काम को भी बताएगा बुरे काम को भी बताएगा इसलिए मैंने पार्टी विशेष पर बात नहीं किया है इंसानियत और बखूबी के विषय में हमने कहा लेकिन फिर भी यह फैक्ट्रियां तो फिर दोबारा नहीं बन पाई या इसके विकल्प में शुगर मिल नहीं बनी गई विकल्प इसका देखिए अभी इन्होंने ठीक कहा कि कपड़ा कमेटी में चला गया अंडरटेिंग सेंट्रल गवर्नमेंट हो गया अच्छा तो 14 वर्षों से यह यह जो पूरे देश की जो कल कारखाने व्यवस्था है 140 करोड़ लोग तो 14 वर्ष से भाजपा सरकार के अधीन है सरकार का 2014 से हां 2014 से आप 2014 में कहते हैं कि विकास का रफ्तार देश पकड़ा 2014 के बाद में तो आपके चैनल के माध्यम से मैं जानना चाहता हूं जो 2014 में जो सत्ता संभाला 2014 के पहले बोकारो में इस पर कारखाना किसने किया भाई रोका तो दुख में बीच में तू मत बोला तू हम हम बोल तू बोलिए भाई हमको बोलने दीजिए अपना समाज कीजिएगा आप ले लीजिए तीन घंटा इंटरव इनको दीजिए मैं जानना चाहता हूं कि 2014 से अगर इस देश में रफ पकड़ा तो बिलाई का कारखाना किसने बनाया दुर्गापुर का कारखाना किसने बनाया बरौनी रिफाइड किसने बनाया हैवी इंजीनियरिंग जो है सो झारखंड में रांची में किसने खोला दुर्गापुर राउर किला प्लांट किसने बनाया अगर विकास 14 में हुआ तो आपने 14 के बाद में कहीं हर हाथ को काम हर खेत को पानी एक सुई का कारखाना भी तो नहीं हां आपने लगाया मनरेगा लगा दिया कौन कौन तो कांग्रेस के टाइम कौन कौन कन्या योजना लगा दिया यह लगा दिया वह लगा दिया खाता में पैसा नहीं है सारा काम आप उसमें उझा दिया लेकिन आप बताइए कि आपने आदमी का आमदनी कितना हुआ खर्चा कितना हुआ देश के आमदनी और खर्चा के व्य नहीं बताते हैं हम कितने नंबर पायदान पर थे हमारे नेता चौधरी चरण सिंह कहते थे जब हम लोग आजाद हुए तो हम लोग विश्व के 50व पायदान पर थे उतना नीचे थे आज हम लोग 150 से नीचे हैं अब जरा इनकी बात सुन लेते हैं आप बताइए देखिए वह किसी भी नेता की पॉलिटिक्स से मैं नहीं जा रहा हूं यहां पे जो हम लोग का अपना दर्द है जी वही मैं बयान कर रहा हूं प्लीज ठीक है प्रॉब्लम ये है कि ये यूनिट आप भी अभी जानते हैं कि पोलुशन के कारण किसी नगर क्षेत्र में कोई एक फैक्ट्री अब नहीं बैठने वाली तो ये ऑब्वियसली यहां पे तो बनेगी ही नहीं कभी कोई भी नेता कुछ भी कर ले अभी ये मरहौरा नगर में तो नहीं बनने वाली लेकिन इसके पास अपनी जमीन बहुत सारा है जहां पर फैक्ट्री बन सकती है दूसरा चीज है कि बिहार का मध्य निषेध कानून उसके कारण से शुगर फैक्ट्री यहां पे कोई भी नहीं बन सकती है आज आप उठा करके देख लें बिहार में कोई भी शुगर फैक्ट्री नहीं चल रही है इसका कारण मध्य निषेध है इथेनॉल है जो इथेनॉल नहीं बनेगा शुगर फैक्ट्री नहीं चलेगी शराबबंदी नहीं हटेगी तो शुगर फैक्ट्री बंदी की बात नहीं है आप जो एथेनॉल अगर शुगर फैक्ट्री बनाएगी तो उसको आप सेफली कहां बाहर ले जाकर के बेचिएगा वो आपको यहां की बिहार सरकार को ही तय करना है अब जितनी भी शुगर फैक्ट्रियां आज ये जो कंपनी में हम लोग खड़े हैं इसके पास चार फैक्ट्रियां होती एक बिहार में थी और तीन फैक्ट्री जो है यूपी में थी कटकिया पडौना और एक नहीं सिधिया नहीं सिधलिया जो है वह बिरला ग्रुप का है सिविलिया बहुत बाद की है इसकी गौरी बाजार कटकुइया पडौना गौरी बाजार और ये मढौरा जिसमें सबसे फर्स्ट में बंद हुई तो गौरी बाजार और उसके बाद सेकंड में ये मढौरा लेकिन आप तो मतलब ऐसा बता रहे क्योंकि आपने बचपन में देखा होगा आपके दादा यहां काम करते मेरे परदादा काम करते थे यहां पे वो अंग्रेजों के टाइम में आपसे आप यहां बात होती थी आपदा नहीं परदादा को तो मैंने देखा भी नहीं है बाबा से मेरी बात हुई है मेरे दादा जी से बात हुई हमने तो अपने परदादा को देखा था तो ये आप लोग बता रहे थे अब वो मॉर्न वाली फैक्ट्री कहां है वहां भी चल लेते हैं हां वो बिरला ग्रुप की फैक्ट्री है वो मॉर्न तो उसको अगर ये कारण है तो वो मजदूरी यूनियन है नहीं ये अच्छा थोड़ा इसके बारे में और बता दीजिए ये जो जमीन है ये जो एकदम अबंडेंट पड़ा हुआ इलाका है ये जमीन किसकी है जमीन ये तो जमीन शुगर फैक्ट्री की शुगर फैक्ट्री की अब अगर इस जमीन जमीन का कुछ और इस्तेमाल कर लें इसको हटा दें या फिर इसको संग्रहालय बनाए मैं वही बोल रहा हूं कि इंडस्ट्री कोई भी बैठ सकती है लेकिन फैक्ट्री नहीं बैठ सकती है यहां पे यहां पे कोई शुगर फैक्ट्री नहीं बैठ सकती है कि ताकि आज कोई इन्वेस्टर आए इन्वेस्ट कर दे और उसके बाद फिर पोलशन का लेकर के फिर बंद कर दिया जाए ये ये जो है केंद्र सरकार के अधीन है ये जमीन हां ये केंद्र सरकार के अधीन है टेक्सटाइल मंत्री तो गिराश है यहां अभी जो इसके जमीन है यहां पे अपना अरणाकोटी अरणाकोटी तो उसको अभी टेक्सटाइल मिनिस्ट्री ने ही दिया है वहां पे बिजली संयंत्र बैठ रहा है काम चालू हो गया वहां पे हम चले थोड़ा उधर मॉडर्न वाला भी देख लें बहुत थोड़ा उसके बाद आप यहां का काम समाप्त हो गया रास्ता यहां तो बात हो गई अब थोड़ा वो भी देख लें पता तो चले तो वहां पे तो आपको भू भूमाफिया का तांडव दिखाई देगा चलेंगे आप उधर बताएंगे बिक गया है वो हम वह बिक गया है चलिए उधर भी चलके देख लेते हैं लोगों को पता तो चल जाए कि एक चॉकलेट यहां बिहार की धरती से भी आता था आप एयर इंडिया में सप्लाई होता था इसका चॉकलेट अच्छा एयर इंडिया में इसकी बहुत सारी जो आपको जैसे कि जाते हैं आप घुसते हैं घुसने के साथ ही आपको चॉकलेट सर्व किया जाता है तो उसमें हमारी मन का भी चॉकलेट हुआ करता था चलिए जरा देख के आते हैं ऐसी चॉकलेट कहां मिलती थी कहां और कैसे बंद हुआ वो कहानी भी जान लेंगे हम चीनी मिल से एक फैक्ट्री में आ गए एक यहां पे मैं इस पे फोटो लगा दूंगा एक मशहूर कंपनी हुआ करती थी मन जो यहां से चलती थी घनश्याम दास बिरला जी बड़े कारोबारी हुए गांधी जी के बड़े सहयोगी हुआ करते थे और उनकी फैक्ट्री यहां से चलती थी उसकी चॉकलेट मिलती थी और बड़ा बोलते थे खुशबू वाली चॉकलेट है वो बहुत टाइप का मंत्र था और चॉकलेट बिहार में नहीं भारतवर्ष के साथ-साथ विदेशों में इस चॉकलेट का मांग था ये बता रहे थे कि एयर इंडिया में सर्व होती थी एयर इंडिया उस वक्त हमारी तो एक ही कंपनी थी एयर के लिए एयर इंडिया जिसमें इसकी चॉकलेट एक मतलब सर्व किया जाता था जब हम लोग जाते थे कभी उसके बाद मतलब ऐसा नहीं था कि केवल इंडिया में ही था नेपाल भूटान बांग्लादेश अगल-बगल के इंग्लैंड में भी जाया करती थी इसकी सब इसकी दो चार जो अच्छे-अच्छे स्वाद की थी जो टॉफी थी वो एक था लैक्टोबन बोन अच्छा वो बहुत अच्छा टेस्ट हुआ करता था हम लोग खुद यहां के जो लोकल लोग थे उस वक्त अपने संबंधियों के यहां जब जाया करते थे तो हम लोग कोई भी दूध से बनी हुई मिठाइयां नहीं ले जाते थे अच्छा यहां मॉटन मिल्क के ही जो टॉफी थी और उसमें गिफ्ट पैक भी आया करता था टीन के बक्से में वो गिफ्ट पैक लेकर के जाया करते थे अगर आप लोग उस जमाने के और ये जो चॉकलेट का नाम भैया बता रहे हैं लैक्टो बनबो और ये मटन की तो कमेंट करके जरूर बताइए आपने खाया नहीं अभी तक किसी कंपनी ने किसी कनफेक्शनरी ने काली मिर्च की टॉफी नहीं बनाई है जो मटन बनाया करती थी मटन में ही काली मिर्च की टॉफी बनती थी जब आपको सिकनेस जो होता है अपने ड्राइविंग पे जा रहे हैं कहीं पे लॉन्ग ड्राइव पे निकल गए हैं तो उस सिकनेस के दौरान वो टॉफी अगर मुंह में रख लिया जाता था तो वोमेटिंग नहीं होती थी तो ये क्यों बंद हुई बंद होने के कारण वही सब जो जो फैक्ट्री वहां बंद हो गई यहां भी वही बात हुई मन के जो पदाधिकारी थे एम्प्लाइज यूनियन के लोगों ने यहां हंगामा किया क्या वोट नए एज बोर्ड प्लान वोट ये और यूनियन के चलते और यहां के छूटभों के चलते अंतर्गत क्योंकि एक प्राइवेट सेक्टर में था एक घराने से आता था ना तो उस झंझट से पार होने के लिए कहा कि एक यूनिट इसको बंद कर तो क्या हुआ था मॉटन जो फैक्ट्री थी वह लास्ट 2000 तक रन की बहुत मुश्किल से प्रॉब्लम यहां पे क्या था बंद होने के दो रीजन थे पहला रीजन लेबर यूनियन सेकंड रीजन जो था यहां पे जो मैनेजमेंट था वो चोर था यहां से आसपास सारे दूध इकट्ठा किया जाता था दूध आता था यहीं पे यह जहां पर हम लोग खड़े हैं यहां पर मिल्क टेस्टिंग होती थी मिल्क टेस्टिंग होती थी और यह आप देख लीजिए यहां से रसीद मिलता था अच्छा यह जो छोटा सा छोटा सा बना हुआ है पोस्ट ऑफिस का जैसे होता था पहले वहां पे क्या होता था कि आपको एक कार्ड बना दिया जाता था वो सारे दूध वाले भाई लोग आते थे अपना और दूध दिया सैंपलिंग हुई टेस्टिंग कर लिया गया उसमें कितना पानी है क्या है अपना सब चेक करके वो क्या होता था कि वहां पर मैनेजमेंट के साथ मिलकर के दूध को पानी मिलाकर के पास कर दिया जाता था तो यही कारण रहा कि धीरे धीरे धीरेधीरे बंद होने की कगार घर पे चला गया आप लोग तो देखे होंगे इसकी टॉफी आप लोग तो खाए ही होंगे बहुत ज्यादा हां हां बहुत ज्यादा अच्छा अच्छा टॉफी बनता था यहां पर कितने मिलती थी क्या कितने रुपए मिलती थी अरे 25 पैसा 50 पैसे बहुत ज्यादा था उस समय पैसे का टॉफी हां 5 पैसे का 10 पैसे का 5 पैसा 10 पैसे पांच मैंने 5 10 पैसे का टॉफी खाया 5 पैसा 10 पैसा का टॉफी मिलता था खूब बड़ा जो टॉफी था वो चार अना का मिलता था हां 25 25 पैसे का सबसे महंगा टॉफी जो इलेक्ट्रिक बॉम्बे इन्होंने कहा ना और सबसे महंगी टॉफी 25 पैसे की वो डाइलट होता था ना जीप के अंदर तो अंदर से खोवा निकलता था हां मिस करते हैं आप लोग उस टेस्ट को कभी मिला ऐसा टेस्ट क्या हम लोग बचपन में जब पास हम लोग का बनता था उस वक्त घूमने के लिए कोई बाहर से रिलेटिव आया तो पास बनाया जाता था घूमने के लिए आते थे बर्फी नहीं खाते हैं एक बर्फी टाइप का चॉकलेट बनता था प्योर मिल्क का समझे बड़ा छोटा एरिया दिख रहा इतने में थी ये आपको उधर जरा कैमरा आप दिखा दीजिए ये सारी जो बिल्डिंग बनी हुई है ना ये इसी का कैंपस है अच्छा ये ये जो मॉल आपको दिखाई दे रहा है ये इसी का कैंपस है अभी वो लास्ट बाउंड्री वाल भी दिखाई दे रहा है तो ये जमीनें इन्होंने बेच दी है लोगों ने कब्जा हां नहीं नहीं बेची है हां देखिए वो शुगर फैक्ट्री का जो है देख रहे हैं ना वो जो है उसके इधर से गर्दन वहां तक इसका है वहां तक वहां पीस में इसका संगीत का था बजाने वजाने गाने का एक फील्ड था यहां गंदा होती थे बाहर बाहर के सब टीम मारते थे यहां करोड़ों रुपए का प्रोडक्शन होता था बहुत बहुत करोड़ों से ऊपर का साल का यहां दिन शिप चलता था चीनी मिल भी करोड़ों का प्रोडक्शन करती थी वहां भी यहां पे देखिए मेनली हम इधर आ जाते हैं बारिश हो रही है कैमरे में दिक्कत होती है गिनते हैं उस वक्त चार फैक्ट्रियां रन करती थी यहां पे वो चार फैक्ट्रियां जहां पे रन करें वहां पे तो करोड़ों का और आज के डेट में बोला तो लोग बड़े समृद्ध रहे होंगे बहुत बहुत जो भी थे समृद्ध थे और यहीं के लोग नहीं थे आपको मैंने लास्ट ईयर लास्ट फाइव इयर्स हो गए यहां पे जो बाहरी लोग थे ना उन लोगों को मैंने बुलाया था जो पहले यहां पे काम करते थे वो लोग राजस्थान झुंझुनू वगैरह साइड से सब लोग आए हुए थे कानपुर राजस्थान से यह सारे जगह से लोगों को बुलाया था यहां पे जो शुगर फैक्ट्री में लोग काम करते थे मोटर मिल में काम करते थे सारन इंजीनियरिंग में काम करते थे कुछ लोग अभी भी हैं जो यहां के लोकल हैं वो लोग हैं मैं खुद भी शुगर फैक्ट्री के ही क्वार्टर में रहता हूं लेकिन अगर जैसे यह फैक्ट्रियां चली अगर वैसा माहौल बनाया जाए लोगों के द्वारा सरकार के द्वारा तो यह जो नए लड़के हैं युवा पीढ़ी के इनको यहां रोजगार मिल जाएगा मिलेगा एक बात तो और जान लीजिए इधर आ जाओ इधर आओ क्या करते हो आप किस चीज की बीपीएससी बीपीएससी की तो ये मैं जैसे पूछ रहा हूं आप लोगों की जरूरतें क्या है जरूरतें जैसे बाहर जैसे गांव के लोग जाते हैं बाहर कमाने के लिए वो बंद हो जाएगा जैसे हम भी लोग पढ़ते हैं कोई दूसरा ऑप्शन रहेगा यहां पे भी अगर पढ़ाई पढ़ने का शौक है ज्यादा तो पढ़ाई भी होगा अगर कुछ नहीं होता है तो यहां पे भी जैसे दादा लोग यहां बतलाते थे लोग कि काम करते थे इसमें यहां के एम एमपी कौन है यहां के राजीव प्रताप रूडी बीजेपी से और एमएलए कौन है जितेंद्र कुमार राय आरजेपी तो इन लोगों ने कुछ कामवाम किया है अभी तो अब उस पर उस पर चर्चा मत करवाइए आप चुप्पी साध ले रहे हैं तो इसका मतलब कहानी हमको समझ में आ गई उस पर चर्चा करवाइए मत कीजिए फैक्ट्री के विषय में लेना है तो लीजिए और उस पर डिबेट कराइएगा तो बहुत बड़ा लंबा हो जाएगा लंबा हो जाएगा और मजा भी किरकिरा हो जाएगा मजा भी किरकिरा ठीक बात है आप अगर सुनिए एक शब्द और सुन लीजिए भले ही अंग्रेजों को लोग गाली दे अगर कुछ ले गया तो बहुत कुछ दे भी गया रेलवे लाइन बहुत लेकिन एक काम करके गया महावरा सारन जिला के लिए जिस प्रकार सपना में अगर कुबेर का खजाना मिल जाता है तो महावरा वासियों के लिए सारन जिला के लिए और सारन जिला नहीं आप कहते हैं सारण प्रमंडल के लिए उसने एक कुबेर का खजाना देके गया फैक्ट्री बैठा के फायदा उसमें क्या था जिस गरीब को उस जमाने में 2000 की रुपए की जरूरत है और आपका रसीद फंसा हुआ है तो वह व्यापारी से कहता था मेरा रसीद भर जाएगा आपको मैं पैसा दे दूंगा वो रसीद उसका ग्रांट जैसे बैंक में ग्रांटर होता था वो रसीद उसका ग्रांटर होता था उसको 2025 ना 3000 का चाहे कपड़ा हो लत्ता हो किराना हो गना हो सब मिल जाता था अपने बेटा बेटी की ब्याह आराम से वो कर लेता था समझ गया मैं अब मैं आपसे ये जानना चाहता हूं आखिरी में लास्ट क्योंकि आप समाजवादी विचारों के आदमी हैं चलते-चलते मैं आपसे आजकल जो लोग समाजवादी राजनीति का दावा करते हैं आपको लगता है कि वो लोग उस पैमानों को मैच कर पाते हैं बिना नाम लिए देखिए बिना नाम लिए मैं एक शेर के माध्यम से आपको उसमें सब लगा देता हूं पंछी कहता है कि चमन बदला है पंछी कहता है कि गगन बदला है मालिक कहता है कि चमन बदला है हम इस देश के वासी या महावरा के वासी छपरा के वासी हम सब जनता ये कहते हैं ना गगन बदला है ना चमन बदला है बात तो वही पुरानी है सिर्फ उस उस लाश का कफ़न बदला है क्या बात है एक दो लाइन में जो है बाबू जी ने सारा कहानी कंप्लीट कर दी नेताओं पे इससे बड़ी टिप्पणी मतलब हाल फिलहाल में मैंने नहीं सुनी उन्होंने अपने अनुभव से अपने पढ़ाई से कभी मैं आऊंगा चर्चा करने आपसे बाकी और जो बातों अच्छा को किंचन इस चैनल के माध्यम से बना दिए मेरे लिए नहीं नहीं अरे कैसी बात कर रहे हैं आप हम तो आप मिल गए इतनी अच्छी बात हो गई इतनी अच्छी जानकारी मिल गई नहीं तो हमको कौन बताता बताइए आप मिले भैया मिले तो जो है इतनी जानकारी मिल गई नहीं तो उस खंडहर में कोई है बियाबान में ये तो आप लोग मिल गए तो ये हमारा सौभाग्य है न्यूज़प का सौभाग्य है कि आप लोग मतलब दर्शक हमारे होंगे या फिर कोई आपको बताया होगा कि हम आए हैं लड़ाई हमने चालू कर दी है यहां के मजदूरों का जो लड़ाई है हम लोगों ने चालू की है अभी जो पैसा बकाया है उसकी लड़ाई हम लोग लेबर कोर्ट चले गए हैं फैक्ट्री इंटर भी कर गई है और अब देखिए आगे क्या होता है लोकतंत्र में राजनीति होनी चाहिए लेकिन विकास के मामले में राजनीति जाति धर्म को नहीं होना चाहिए विकास विकास होता है इसमें गरीब को महंगाई से एक बात मैं कहना चाहूंगा यहां के लोकल पॉलिटिक्स किसी ने भी पॉलिटिशियंस ने इन सब मुद्दों पर कभी कोई बातचीत नहीं की कभी नहीं तो ये जब आप जब देखिए ये चुनावी मुद्दा ही नहीं होगा तो वो क्यों इसके लिए काम करेंगे आप तो फिर जाति देख के वोट दे रहे हैं आप धर्म देख के वोट दे रहे हैं आप उसका गाड़ी देख के वोट दे रहे हैं उसका भौकाल देख के वोट दे रहे हैं जो है बिहार की राजनीति ही है नहीं तो नहीं हुआ इसीलिए इसीलिए बिहार की राजनीति में ये हमको दिख गया ये खंडहर ये जो सोचिए ये इलाका किसी जमाने में कितना समृद्ध रहा होगा अंग्रेजों के जमाने में सारण जिला बिहार का जहां चार-चार बड़ी फैक्ट्रियां हो जहां से जहां लोग अभी जैसे कहते हैं ना कि लोग कोलकाता जा रहे हैं कमाने वो जमाना था जब लोग सारण कमाने आते थे आज ये सारण जो है तरस रहा है कि एक आध अच्छी फैक्ट्री बन जाती या एक आध अच्छे संस्थान होते जहां हमारे बच्चे पढ़ते हमारे लोग पढ़ते मुजफ्फरपुर जाइएगा हैं ये लोकतांत्रिक व्यवस्था में चलते-चलते एक शेर सुना देते हैं आप जाते रहिएगा हां एक शेर और सुना दीजिए जाति धर्म मजहब से ऊपर उठ की बात है है तो दूसरा लेकिन कन्वर्ट करके बताते हैं हम वोट देते हैं किसी के मत में आके पार्टी हमारा दिल्ली में बैठा है वोट यहां देते हैं पार्टी हमारा कहीं बैठा है हम अपना विवेक खो देते हैं दूसरे के विवेक से काम करते हैं परिंदे भी नहीं ठहरते गैर के आशियानों में चिड़िया दिन भर चला चलती है लेकिन अपना घोंसला में नहीं ठहरती परिंदे भी नहीं ठहरते गैर के आशियानों में हम तो तमाम उम्र गुजार दी लोकतांत्रिक व्यवस्था में किराए के मकानों में परिंदे भी नहीं ठहरते गैर के आशियानों में हमने तो अपना तमाम उम्र गुजार दी किराए के मकानों में आप चाहते तो हालात बदल सकते थे आप चाहते तो हालात बदल सकते थे आपकी आंखों के आंसू मेरे आंखों से भी निकल सकते थे आप तो ठहर गए झील के पानी इस लोकतांत्रिक व्यवस्था में धर्म मजहब जाति विवाद से ऊपर उठ के निकलते तो बहुत दूर तक निकल सकते थे क्या बात बहुत दूर तक निकल सकते थे जय भारत 75 वर्ष का एक बुजुर्ग इस देश को संदेश दे रहा है इस देश को सुनना चाहिए समझना चाहिए 

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